

एक ऐसा राजनेता, जिसने इंदिरा गांधी से लेकर पी.वी. नरसिम्हा राव (From Indira Gandhi to P.V. Narasimha Rao) के दौर तक, पूरे 16 साल तक कांग्रेस की तिजोरी की चाबी अपने पास रखी। भारतीय राजनीति के इतिहास में 'खजांची' ('Treasurer') के नाम से मशहूर सीताराम केसरी (Sitaram Kesari) सिर्फ एक नेता नहीं, बल्कि पर्दे के पीछे रहकर सत्ता की बिसात बिछाने वाले सबसे चतुर संगठनकर्ता और किंगमेकर थे।
बिहार के दानापुर की साधारण गलियों से निकलकर दिल्ली के लुटियंस ज़ोन और सत्ता के सर्वोच्च शिखरों तक पहुँचने का उनका सफर किसी फिल्मी पटकथा से कम नहीं है। केसरी जी की खासियत यह थी कि वे कभी जनता के बड़े नेता नहीं रहे, लेकिन संगठन पर उनकी पकड़ इतनी फौलादी थी कि बड़े-बड़े दिग्गज उनके सामने सिर झुकाते थे। वे राजनीति के वो माहिर खिलाड़ी थे, जिन्होंने विपरीत से विपरीत परिस्थितियों में भी न सिर्फ कांग्रेस के फंड को संभाला, बल्कि गठबंधन सरकारों के दौर में किंगमेकर की भूमिका भी निभाई।
सीताराम केसरी (Sitaram Kesari) का जन्म नवंबर 1919 में बिहार के पटना जिले के दानापुर (Danapur in Patna, Bihar) में एक साधारण वैश्य परिवार में हुआ था। घर की आर्थिक स्थिति बेहद सामान्य थी, लेकिन उनके भीतर देश को आजाद देखने की जिद बचपन से ही पल रही थी। यही वजह थी कि मात्र 13 वर्ष की कच्ची उम्र में महात्मा गांधी (Mahatma Gandhi) के विचारों से प्रभावित होकर स्वतंत्रता आंदोलन में कूद पड़े।
1930 के दशक के सविनय अवज्ञा आंदोलन (Civil Disobedience Movement) से लेकर 1942 के ऐतिहासिक 'भारत छोड़ो आंदोलन' ('Quit India Movement') के दौरान उन्होंने सक्रिय भूमिका निभाई। इस देशप्रेम की कीमत उन्हें कई बार जेल जाकर चुकानी पड़ी। वे 1930, 1932 और 1942 के दौरान ब्रिटिश सरकार द्वारा गिरफ्तार किए गए और सालों जेल की सलाखों के पीछे बिताए। आजादी के बाद उन्होंने बिहार की प्रांतीय राजनीति में अपनी जमीन मजबूत की। उनकी सांगठनिक क्षमता को देखते हुए उन्हें बिहार प्रदेश कांग्रेस कमेटी (BPCC) का अध्यक्ष बनाया गया। बिहार कांग्रेस के मुखिया के रूप में उनके सफल कार्यकाल और संकटमोचक की भूमिका ने दिल्ली में बैठे आलाकमान का ध्यान खींचा, जिसके बाद उनके कदम राष्ट्रीय राजनीति की ओर बढ़े।
सीताराम केसरी (Sitaram Kesari) के राजनीतिक जीवन का सबसे बड़ा टर्निंग पॉइंट साल 1980 में आया। जब इंदिरा गांधी सत्ता में वापस लौटीं, तो उन्हें पार्टी के लिए एक ऐसे वफादार और चतुर रणनीतिकार की जरूरत थी जो कांग्रेस के वित्तीय साम्राज्य को संभाल सके। इंदिरा जी की पारखी नजर सीताराम केसरी पर पड़ी और उन्होंने केसरी जी को अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी (AICC) का राष्ट्रीय कोषाध्यक्ष (Treasurer) नियुक्त कर दिया। यह एक ऐसी जिम्मेदारी थी, जिसे उन्होंने अगले 16 सालों तक बखूबी निभाया।
इस दौरान भारतीय राजनीति में कई बड़े तूफान आए और कांग्रेस ने तीन अलग-अलग प्रधानमंत्रियों का दौर देखा। इंदिरा गांधी (Indira Gandhi) की हत्या के बाद राजीव गांधी (Rajiv Gandhi) आए और फिर पी.वी. नरसिम्हा राव (PV Narasimha Rao) का दौर आया, लेकिन पार्टी के 'महा-खजांची' ('Grand Treasurer') के रूप में केसरी जी का दबदबा कभी कम नहीं हुआ। नेताओं की वफादारियां बदलती रहीं, पर आलाकमान का उन पर भरोसा कभी नहीं डगमगाया।
केसरी जी का फंड मैनेजमेंट अद्भुत था। राष्ट्रीय चुनावों से लेकर राज्यों के चुनावों तक, पार्टी के लिए वित्तीय संसाधन जुटाना और गुप्त फंड को सुरक्षित रखना उनकी उंगलियों का खेल था। कॉरपोरेट जगत से लेकर आम कार्यकर्ताओं तक, वे जानते थे कि किससे और कैसे पार्टी के लिए चंदा इकट्ठा करना है। बिना किसी दिखावे के, चुपचाप पर्दे के पीछे से पूरी कांग्रेस की अर्थव्यवस्था को नियंत्रित करना ही उनकी सबसे बड़ी ताकत थी।
सीताराम केसरी (Sitaram Kesari) केवल अपनी गंभीर राजनीति के लिए ही नहीं, बल्कि अपने बेहद दिलचस्प मिजाज, अतरंगी आदतों और हाजिरजवाबी के लिए भी लुटियंस दिल्ली में मशहूर थे। उनके जीवन से जुड़े कुछ किस्से आज भी राजनीतिक गलियारों में बड़े चाव से सुनाए जाते हैं।
केसरी जी खाने-पीने के बेहद शौकीन थे, और मीठे में 'लड्डू' तो उनकी कमजोरी थे। कांग्रेस के कोषाध्यक्ष होने के नाते उनके घर पर नेताओं और उद्योगपतियों का आना-जाना लगा रहता था। अक्सर उनके घर के सोफे, मेज या कमरों में रुपयों के बंडल खुले बिखरे पड़े रहते थे, जिसकी वे ज्यादा परवाह नहीं करते थे। लेकिन मजाल है कि कोई उनके कमरे में रखे खास लड्डुओं को हाथ भी लगा दे! जब कोई उनसे पूछता कि आप पैसों को खुला छोड़कर लड्डुओं को संदूक में ताला लगाकर क्यों रखते हैं? तो केसरी जी अपनी चिरपरिचित मुस्कान के साथ बिहार के ठेठ अंदाज में कहते, "अरे भाई! पैसा तो पार्टी का है, आएगा-जाएगा, लेकिन यह लड्डू मेरा अपना है!”
केसरी जी खुद को कांग्रेस (Congress) का सबसे वफादार और पुराना सिपाही मानते थे। वे उन नेताओं से सख्त चिढ़ते थे जो कल पार्टी में आते थे और आज बड़ा पद मांगते थे। ऐसे नए-नवेले या मौकापरस्त नेताओं को सबक सिखाने के लिए उनका एक तकियाकलाम था 'चवन्नी छाप'। वे अक्सर अपने विरोधियों या कम तजुर्बेकार नेताओं को सरेआम 'चवन्नी छाप' कहकर चिढ़ा दिया करते थे। उनका मानना था कि राजनीति में कद चंदे या चापलूसी से नहीं, बल्कि सालों की तपस्या और वफादारी से बनता है।
केसरी जी को कुत्तों से बेपनाह मोहब्बत थी। उनके पास कई पालतू कुत्ते थे, जिन्हें वे अपने बच्चों की तरह रखते थे। दिल्ली की कड़कती राजनीति के धुरंधरों से घिरे रहने के बाद, वे सुकून के पल अपने इन वफादार बेजुबान दोस्तों के साथ बिताते थे। दिलचस्प बात यह थी कि जब वे अपनी शानदार मर्सिडीज कार से बाहर निकलते, तो उनकी बगल वाली सीट पर कोई बड़ा नेता नहीं, बल्कि उनके पालतू कुत्ते शान से बैठकर दिल्ली की सड़कों पर सैर करते थे। वे अक्सर मजाक में कहते थे कि राजनीति में इंसानों की वफादारी बदल सकती है, लेकिन मेरे इन कुत्तों की नहीं!
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साल 1996 में पी.वी. नरसिम्हा राव (PV Narasimha Rao) के इस्तीफे के बाद सीताराम केसरी के राजनीतिक करियर का स्वर्णिम दौर आया, जब उन्हें कांग्रेस का राष्ट्रीय अध्यक्ष चुना गया। हालांकि वे कभी बड़े जननेता नहीं रहे, लेकिन इस सर्वोच्च पद पर बैठकर उन्होंने देश की सत्ता की चाबी अपने हाथ में ले ली। केंद्र की देवगौड़ा और बाद में आई.के. गुजराल (I.K. Gujral) की संयुक्त मोर्चा सरकारों को बाहर से समर्थन देकर चलाना और फिर अपनी शर्तों पर उन्हें गिरा देना, केसरी जी के इसी दौर के बड़े राजनीतिक फैसले थे।
केसरी जी सिर्फ सत्ता के खिलाड़ी नहीं थे, बल्कि वे सामाजिक न्याय के भी एक मुखर पैरोकार थे। बिहार की धरती से आने के कारण वे पिछड़ों और अल्पसंख्यकों के दर्द को समझते थे। उन्होंने मंडल कमीशन की सिफारिशों का खुलकर समर्थन किया और वंचित समाज को राजनीति की मुख्यधारा में लाने के लिए हमेशा आवाज उठाई। पार्टी के भीतर और बाहर दलितों, पिछड़ों और अल्पसंख्यकों की हिस्सेदारी बढ़ाने के उनके प्रयासों ने उन्हें 'पिछड़ों का मसीहा' भी बनाया।
सीताराम केसरी का राजनीतिक अंत (Political end of Sitaram Kesri) उतना ही कड़वा और नाटकीय रहा, जितना उनका सफर शानदार था। साल 1998 में जब सोनिया गांधी (Sonia Gandhi) को कांग्रेस अध्यक्ष बनाने की मांग उठी, तो 24 अकबर रोड (कांग्रेस मुख्यालय) में एक अभूतपूर्व ड्रामा देखने को मिला। कांग्रेस कार्यसमिति की बैठक के दौरान केसरी जी से जबरन इस्तीफा लिखवाने की कोशिश हुई। राजनीतिक गलियारों में यह भी चर्चा रही कि उन्हें कुछ देर के लिए कथित तौर पर दफ्तर के बाथरूम में बंद कर दिया गया था और उनकी नेमप्लेट तक उखाड़ दी गई थी। इस तरह एक बुजुर्ग वफादार को बेहद अपमानजनक तरीके से पद से हटा दिया गया। केसरी जी के लंबे योगदान के लिए उन्हें स्वतंत्रता सेनानी सम्मान और बिहार रत्न जैसे प्रतिष्ठित क्षेत्रीय सम्मानों से भी नवाजा गया था। अक्टूबर 2000 में उन्होंने इस दुनिया को अलविदा कह दिया।
सीताराम केसरी को भारतीय राजनीति के एक ऐसे 'अदृश्य चाणक्य' (Hidden Chanakya) के रूप में याद किया जाएगा, जिन्होंने खुद कभी कोई बड़ा सीधा चुनाव नहीं जीता (वे ज्यादातर राज्यसभा के रास्ते संसद पहुंचे), लेकिन दिल्ली की सल्तनत और बड़ी-बड़ी सरकारें हमेशा उनकी उंगलियों के इशारे पर नाचती रहीं। [SP]