

क्या आपने कभी कल्पना भी नहीं की होगी कि कोई एक इंसान इतना शातिर हो सकता है कि एक नहीं बल्कि दो बार दुनिया के सबसे खूबसूरत अजूबों में गिने जाने वाले पेरिस के एफिल टावर (Eiffel Tower) को बेच सकता है! आइए जानते हैं इस शातिर चोर की अनोखी कहानी।
इस ठग का नाम विक्टर लुस्टिग (Victor Lustig) था। इसका जन्म 1890 में ऑस्ट्रिया में हुआ था। उसका बचपन बड़ा ही दर्दनाक रहा, वह छोटी उम्र में अपने घर-परिवार से अलग हो गया। उसके पिता बड़े क्रूर थे, जो विक्टर लुस्टिग को मारते-पीटते थे। एक बार तो उन्होंने विक्टर की वायलिन से पिटाई की थी।
वहीं, विक्टर 17 साल की उम्र में पढ़ाई-लिखाई छोड़ साल 1909 के अंत में पेरिस पहुँच गया। पेरिस आकर विक्टर गलत चीज़ों में पड़ गया और जुए की बुरी लत का शिकार हो गया। उसी समय उस पर एक लड़की के प्रेमी ने चाकू से हमला किया। चाकू उसके बाएँ गाल पर लगा जिससे उसके चेहरे पर एक निशान बन गया, और आगे चलकर यही निशान उसकी पहचान बन गया।
विक्टर पेरिस आते ही गलत चीज़ों में फँस चुका था। प्रथम विश्व युद्ध के दौरान उसने जुर्म की दुनिया में अपना पहला कदम रखा। उसने फ्रांस और न्यूयार्क के बीच चलने वाले आलीशान क्रूज़ जहाजों पर सफर करना शुरू किया। सफर के दौरान वह खुद को ब्रॉडवे नाटकों का बड़ा प्रोड्यूसर बताता था और जहाज पर मौजूद अमीर यात्रियों से नाटकों में इन्वेस्ट करने के नाम पर पैसे ठगता था। बाद में उसने आलीशान क्रूज़ जहाजों पर जाना तब बंद कर दिया जब प्रथम विश्व युद्ध के कारण समुद्री रास्तों में पनडुब्बियों का खतरा बढ़ गया। इसके बाद वह यह धंधा बंद करके अमेरिका चला गया।
अमेरिका में लगभग दस साल तक छोटी-मोटी धोखाधड़ी करने के बाद वह 1925 में पेरिस वापस लौटा। वहाँ एक दिन अखबार पढ़ते हुए उसकी नज़र एफिल टावर (Eiffel Tower) वाली खबर पर पड़ी। उसने अखबार में पढ़ा कि सरकार एफिल टावर के रखरखाव पर बहुत पैसे खर्च कर रही है। खबर पढ़ते हुए उसका दिमाग तेज़ चलने लगा। उसने उस समय एक खतरनाक योजना बनाई। उसने नकली लेटरहेड की मदद से खुद को 'डिप्टी डायरेक्टर जनरल' बताया और कबाड़ व्यापारियों के साथ एक सीक्रेट मीटिंग की। (Victor Lustig) उसने कबाड़ियों को झांसा देकर एफिल टावर बेच दिया। यही नहीं, उसने आंद्रे पॉइसन नाम के एक व्यापारी को अपने जाल में फँसाकर उससे 70,000 फ्रैंक ऐंठ लिए और फ्रांस से भाग निकला। इस बात से शर्मिंदा होकर आंद्रे पॉइसन ने पुलिस को खबर नहीं की।
इस बात का फायदा विक्टर ने उठाया और दोबारा वही जाल बुनने वापस पेरिस पहुँचा, लेकिन इस बार उसकी पोल खुल गई। उसे जान बचाकर अमेरिका भागना पड़ा।
अमेरिका में उसने लोगों को ठगने का एक नया तरीका ढूँढा। उसने इस बार लकड़ी का एक छोटा बक्सा बनाया, जिसमें नकली बटन और लीवर लगे थे। उसने (Victor Lustig) बड़े माफिया से कहा कि इसमें एक ऐसा तंत्र है जो हूबहू असली नोटों की कॉपी बना सकता है। विक्टर ने टेक्सास के एक शेरिफ को अपना शिकार बनाया और उसे हज़ारों डॉलर में वह बक्सा बेच दिया।
विक्टर ने 1930 में नकली नोट छापना शुरू किया। उसने लगभग पांच सालों के भीतर अमेरिकी बाजार में 2.3 मिलियन डॉलर की जाली मुद्रा चला दी।
वो कहते हैं न, पाप का घड़ा एक दिन जरूर फूटता है। न्यूयॉर्क पुलिस ने विक्टर को 10 मई 1935 को हिरासत में लिया और उसके पास से 51,000 डॉलर के जाली नोट और छपाई की प्लेटें जब्त कीं। लेकिन पेशी से एक दिन पूर्व विक्टर खिड़की से भाग निकला। हालांकि, एक महीने बाद इस शातिर को न्यूयॉर्क पुलिस ने दबोच लिया। पुलिस द्वारा गिरफ्तारी पर विक्टर ने बिंदासपन से कहा, "लो लड़कों, मैं आ गया।"
बता दें, इस ठग को 20 साल की सजा सुनाई गई और विक्टर को 'अल्काट्राज' जेल, जो सबसे खूंखार अपराधियों की जेल मानी जाती है, वहां भेजा गया। 11 मार्च 1947 को 57 वर्ष की उम्र में निमोनिया के कारण उसकी जेल में ही मौत हो गई।(VR/MK)
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