

भारत के स्वतंत्रता संग्राम की कहानी में महात्मा गांधी (Mahatma Gandhi) का नाम साहस, सत्य और अहिंसा के साथ लिया जाता है। लेकिन इतिहास में एक ऐसा भी समय आया जब अंग्रेज़ सरकार ने इसी शांतिपूर्ण नेता पर राजद्रोह (Sedition) का गंभीर आरोप लगा दिया। यह वही कानून था जिसका इस्तेमाल ब्रिटिश सरकार अपने विरोधियों को दबाने के लिए करती थी। सन 1922 में गांधी जी को अदालत में पेश किया गया और उन पर मुकदमा चलाया गया। अदालत में मौजूद लोगों ने एक अनोखा दृश्य देखा, क्योंकि आमतौर पर आरोपी खुद को बचाने की कोशिश करता है, लेकिन गांधी जी ने ऐसा नहीं किया। उन्होंने शांत स्वर में कहा कि अगर अन्यायपूर्ण सरकार के खिलाफ आवाज़ उठाना अपराध है, तो वे इस अपराध को स्वीकार करते हैं। उनकी इस बात से अदालत का माहौल बदल गया। जज भी कुछ पल के लिए भावुक हो गए। इतिहास में यह मुकदमा “Great Trial of 1922” के नाम से प्रसिद्ध है।
18 मार्च 1922 को महात्मा गांधी (Mahatma Gandhi) पर ब्रिटिश सरकार ने भारतीय दंड संहिता की धारा 124A (Sedition Law) के तहत राजद्रोह का मुकदमा चलाया। उस समय भारत में अंग्रेजों के खिलाफ आज़ादी की लड़ाई तेज हो रही थी और गांधी जी ने अंग्रेजी शासन के विरोध में असहयोग आंदोलन शुरू किया था। इस आंदोलन के तहत लोगों से अपील की गई थी कि वे अंग्रेजी शासन का सहयोग बंद कर दें, विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार करें और सरकारी संस्थाओं से दूरी बनाएं। इससे ब्रिटिश सरकार को डर था कि उनकी सत्ता कमजोर हो सकती है, इसलिए उन्होंने गांधी जी की गतिविधियों और उनके लेखों पर नजर रखना शुरू कर दिया।
उसी समय गांधी जी अपने अखबार यांग इण्डिया में लगातार लेख लिखकर ब्रिटिश शासन की आलोचना कर रहे थे। ब्रिटिश सरकार ने खास तौर पर तीन लेख - “ टेंपरिंग विथ लॉयल्टी”, “द पुज़्जल एंड इट्स सॉल्शन” और “ शकीन द मैन्स ” - को आधार बनाकर कहा कि इनसे जनता में सरकार के खिलाफ असंतोष और विरोध की भावना फैल रही है। इसी कारण अंग्रेजों ने इन लेखों को धारा 124A के तहत राजद्रोह माना और गांधी जी के खिलाफ मुकदमा दर्ज कर दिया।
इसी दौरान चौरी चौरा कांड हुआ, जिसमें प्रदर्शनकारियों ने एक पुलिस स्टेशन में आग लगा दी और कई पुलिसकर्मी मारे गए। इस हिंसा से महात्मा गांधी बहुत दुखी हुए और उन्होंने असहयोग आंदोलन को वापस लेने का फैसला कर लिया। हालांकि ब्रिटिश सरकार का मानना था कि गांधी जी के आंदोलन और उनके लेखों ने ही लोगों को सरकार के खिलाफ भड़काया था, इसलिए उन पर राजद्रोह का मुकदमा चलाया गया। जब अदालत में उनसे पूछा गया कि वे दोषी हैं या नहीं, तो गांधी जी ने एक ऐतिहासिक बयान दिया। उन्होंने कहा कि मैंने जो कुछ भी लिखा और किया, वह अपने देश के हित और कर्तव्य को समझकर किया है। उन्होंने साफ शब्दों में कहा, “अगर सरकार के खिलाफ असंतोष पैदा करना अपराध है, तो मैं इस अपराध का दोषी हूं।” गांधी जी ने यह भी कहा कि यदि कानून उन्हें अपराधी मानता है, तो अदालत उन्हें सबसे कठोर सजा भी दे सकती है।
इस मुकदमे की सुनवाई ब्रिटिश जज सी. एन. ब्रूमफील्ड ने की थी, जो उस समय अहमदाबाद के District and Sessions Judge थे। जब अदालत में महात्मा गांधी के खिलाफ फैसला सुनाने का समय आया, तो जज ब्रूमफील्ड ने कहा कि गांधी जी एक महान नेता हैं और लाखों लोग उनका सम्मान करते हैं, लेकिन अदालत का कर्तव्य कानून का पालन करना है। इसके बाद उन्होंने गांधी जी को 6 साल की साधारण कैद की सजा सुनाई।
हालांकि सजा सुनाते समय जज के शब्दों में सम्मान और भावुकता साफ झलक रही थी, क्योंकि वे जानते थे कि वे ऐसे व्यक्ति को सजा दे रहे हैं जिसे करोड़ों भारतीय अपना प्रेरणास्रोत मानते हैं। जज ने यह भी स्वीकार किया कि गांधी जी जैसे व्यक्ति को सजा देना आसान नहीं है, लेकिन कानून के अनुसार फैसला देना उनकी जिम्मेदारी है। हालांकि गांधी जी पूरी सजा नहीं काट पाए और 1924 में खराब स्वास्थ्य के कारण उन्हें जेल से रिहा कर दिया गया। यही कारण है कि यह मुकदमा इतिहास में खास माना जाता है, क्योंकि यहाँ एक तरफ अंग्रेजी कानून था और दूसरी तरफ एक ऐसे नेता की नैतिक शक्ति, जिसने सजा से बचने की बजाय उसे साहस के साथ स्वीकार किया। [SP/MK]