₹150 से शुरू हुआ सफर, बने बॉलीवुड के दिग्गज गीतकार! आनंद बख्शी की कहानी

कभी रेलवे में टिकट कलेक्टर (Ticket Collector) की नौकरी करने वाला एक शख्स, बॉलीवुड (Bollywood) का सबसे बड़ा गीतकार कैसे बना?” यह सवाल सीधे हमें आनंद बख्शी (Anand Bakshi) की जिंदगी की ओर ले जाता है।
आनंद बख्शी (Anand Bakshi)
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कभी रेलवे में टिकट कलेक्टर (Ticket Collector) की नौकरी करने वाला एक शख्स, बॉलीवुड (Bollywood) का सबसे बड़ा गीतकार कैसे बना?” यह सवाल सीधे हमें आनंद बख्शी (Anand Bakshi) की जिंदगी की ओर ले जाता है। आनंद बक्शी का सफर आसान नहीं था। उन्होंने सपनो को लेकर मुंबई का रुख किया, लेकिन शुरुआत में उन्हें लगातार असफलता (failure) और ठुकराव (rejection) का सामना करना पड़ा। हालात ऐसे बन गए थे कि उन्होंने बॉलीवुड छोड़ने का मन भी बना लिया था और एक सामान्य जिंदगी जीने का फैसला कर लिया था। लेकिन किस्मत को कुछ और ही मंजूर था। भगवान (“Bhagwan”) और भला आदमी (“Bhala Admi”) जैसे मौके उनके लिए टर्निंग पॉइंट (turning point) साबित हुए, जिन्होंने उनकी जिंदगी पूरी तरह बदल दी।

शुरुआती जीवन और संघर्ष

आनंद बख्शी (Anand Bakshi) का जन्म 19 जुलाई 1930 में एक साधारण परिवार में हुआ था, लेकिन उनके सपने बहुत बड़े थे। बचपन से ही उन्हें लिखने और शायरी का शौक था। लेकिन जिंदगी इतनी आसान नहीं थी। देश के बंटवारे (Partition) के बाद उनके परिवार को कई कठिनाइयों का सामना करना पड़ा, जिससे हालात और भी मुश्किल हो गए। इन सबके बावजूद, उनके दिल में फिल्मों (films) में काम करने का सपना जिंदा रहा। वह मुंबई आए, लेकिन यहां शुरुआत में उन्हें लगातार असफलता (failures) और ठुकराव (rejection) झेलना पड़ा। कई बार ऐसा लगा कि अब सब खत्म हो गया है। उन्होंने छोटे-मोटे काम भी किए, लेकिन उनका मन हमेशा गीत लिखने में ही लगा रहता था। आर्थिक तंगी और संघर्ष के बीच भी उन्होंने हार नहीं मानी और लगातार कोशिश करते रहे। यही संघर्ष आगे चलकर उनकी सफलता की सबसे बड़ी वजह बना।

पहला मौका: ‘भला आदमी’ और भगवान दादा

संघर्ष के दिनों में आनंद बख्शी (Anand Bakshi) हर दरवाज़ा खटखटा रहे थे।
संघर्ष के दिनों में आनंद बख्शी (Anand Bakshi) हर दरवाज़ा खटखटा रहे थे। X

संघर्ष के दिनों में आनंद बख्शी (Anand Bakshi) हर दरवाज़ा खटखटा रहे थे। इसी दौरान उनकी मुलाकात भगवान दादा (Bhagwan Dada) से जुड़ी एक अहम जानकारी से हुई। बक्शी जी ने उनके ऑफिस के चपरासी (peon) से अच्छी पहचान बना ली थी। उसी चपरासी ने बताया कि फिल्म ‘भला आदमी’ के लिए गीतकार (lyricist) नहीं आ रहा है और भगवान दादा नाराज़ हैं। यह सुनते ही बक्शी जी ने हिम्मत जुटाई और सीधे उनके केबिन में पहुंच गए। उन्होंने खुद को गीतकार बताया और एक मौका (opportunity) मांगा। भगवान दादा ने उन्हें एक सिचुएशन दी और 15 दिन का समय दिया।

बक्शी जी ने हार नहीं मानी और एक नहीं, बल्कि 4 गाने लिखकर ले गए। उनके गीत इतने पसंद (liked) आए कि उन्हें फिल्म में सेकेंड लिरिसिस्ट के तौर पर साइन कर लिया गया। यही नहीं, उन्हें पहली कमाई के रूप में ₹150 भी मिले। यह छोटा मौका ही उनके बड़े सपने की शुरुआत बना।

पहला गाना और शुरुआती झटका

आनंद बख्शी (Anand Bakshi)
आनंद बख्शी (Anand Bakshi) Wikimedia Commons

संघर्ष के बीच आनंद बख्शी (Anand Bakshi) के जीवन में एक खास पल 9 नवंबर 1956 को आया, जब उनका पहला गाना रिकॉर्ड (record) हुआ। इस गीत के बोल थे “धरती के लाल…” और इसके संगीतकार (music composer) थे निसार बज़्मी (Nisar Bazmi)। यह उनके सपनों के पूरे होने की दिशा में एक बड़ा कदम था। लेकिन किस्मत ने यहां भी उनका इम्तिहान लिया। जिस फिल्म के लिए यह गाना रिकॉर्ड हुआ था, वह रिलीज़ (release) ही नहीं हो सकी। इस वजह से उन्हें वह पहचान नहीं मिल पाई, जिसकी उन्हें उम्मीद थी। यह उनके लिए एक बड़ा झटका था, लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी। कठिन हालात के बावजूद उन्होंने अपने संघर्ष को जारी रखा और आगे बढ़ते रहे।

एक मुलाकात जिसने बदल दी जिंदगी

संघर्ष के दिनों में आनंद बख्शी (Anand Bakshi) की हालत बहुत खराब हो चुकी थी। आर्थिक तंगी (financial crisis) इतनी बढ़ गई थी कि उनके पास रहने और खाने तक के पैसे नहीं बचे थे। एक दिन वे मरीन लाइन (Marine Lines Railway Station) पर बैठे अपनी डायरी में शायरी लिख रहे थे और मन ही मन बंबई छोड़कर वापस जाने का फैसला कर चुके थे।

संघर्ष के दिनों में आनंद बख्शी (Anand Bakshi) की हालत बहुत खराब हो चुकी थी।
संघर्ष के दिनों में आनंद बख्शी (Anand Bakshi) की हालत बहुत खराब हो चुकी थी।X

तभी एक टिकट चेकर उनसे टिकट मांगने आया। जब बक्शी जी ने अपनी मजबूरी बताई, तो उसकी नजर उनकी डायरी पर पड़ी। उसने उनकी शायरी सुनी और बहुत प्रभावित (impressed) हुआ। यही से कहानी में चित्रमल स्वरूप (Chitramal Swaroop) की एंट्री हुई। चित्रमल स्वरूप ने उन्हें अपने घर, बोरीवली के ज्वाला एस्टेट (Jwala Estate, Borivali) में रहने का ऑफर दिया। उन्होंने न सिर्फ रहने की जगह दी, बल्कि रोज 2 रुपये भी देते थे, ताकि बक्शी जी अपने सपनों के लिए कोशिश जारी रख सकें। करीब 4 साल तक उन्होंने बिना किसी लालच (selfless help) के उनकी मदद की, जो उनकी जिंदगी का सबसे बड़ा मोड़ (turning point) बन गया।

बेटे ने लिखी किताब

आनंद बख्शी (Anand Bakshi) की जिंदगी से जुड़े कई अनसुने किस्से (untold stories) उनके बेटे राकेश आनंद बख्शी (Rakesh Anand Bakshi) ने अपनी किताब Nagmein Kisse Baatein Yaadein: The Life and Lyrics of Anand Bakshi में लिखे हैं। इस किताब में उनके संघर्ष, निजी जीवन और करियर से जुड़े दुर्लभ किस्से मिलते हैं, जो उन्हें और करीब से समझने का मौका देते हैं। यही वजह है कि यह किताब फैंस के लिए “pure gold” मानी जाती है, क्योंकि इसमें सिर्फ सफलता नहीं, बल्कि उनके संघर्ष और भावनाएं भी दिखाई देती हैं। [SP/MK]

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