राजेश खन्ना के 12 ऐसे किस्से, जो स्टारडम का सच दिखाते हैं

राजेश खन्ना वह नाम है जिसने अपनी एक्टिंग से 60–70 के दशक में पूरे देश को दीवाना बना दिया था। जिनकी एक झलक पाने के लिए लड़कियाँ घंटों उनके घर के बाहर खड़ी रहती थीं, जिनकी तस्वीरों से लोग शादी तक कर लेते थे, और जिनके गाने आज भी दिलों में ज़िंदा हैं।
राजेश खन्ना  (Rajesh Khanna) कुर्सी पर बैठे और मुस्कुराते हुए
राजेश खन्ना (Rajesh Khanna) वह नाम है जिसने अपनी एक्टिंग से 60–70 के दशक में पूरे देश को दीवाना बना दिया था।Ai
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  • राजेश खन्ना ने शोहरत की सबसे ऊँचाई भी देखी और अकेलेपन की गहराई भी।

  • जिस अभिनेता की एक झलक पर दीवानगी थी, वही जीवन के अंत में गुमनामी से जूझता रहा।

  • राजेश खन्ना सिर्फ एक सुपरस्टार नहीं, बल्कि भावनाओं से भरा इंसान थे।

राजेश खन्ना (Rajesh Khanna) वह नाम है जिसने अपनी एक्टिंग से 60–70 के दशक में पूरे देश को दीवाना बना दिया था। जिनकी एक झलक पाने के लिए लड़कियाँ घंटों उनके घर के बाहर खड़ी रहती थीं, जिनकी तस्वीरों से लड़कियां शादी तक कर लेती थीं| तक कर लेते थे, और जिनके गाने आज भी दिलों में ज़िंदा हैं। लेकिन क्या आप जानते हैं कि यही सुपरस्टार एक दौर में इतना अकेला और बेबस हो गया था कि उसे सार्वजनिक शौचालय की लाइन में आम आदमी की तरह खड़ा होना पड़ा, और वह दर्द से बस इतना ही कह पाया “नाम खराब हो गया है”?

राजेश खन्ना (Rajesh Khanna) की ज़िंदगी बाहर से जितनी चमकदार नज़र आई, अंदर से उतनी ही भावुक और टूटी हुई थी। स्टारडम के शिखर से लेकर गुमनामी की खामोशी तक का उनका सफ़र आसान नहीं था। दोस्त दूर होते गए, रिश्ते बिखरते गए, करियर ढलता गया और भीतर का इंसान अकेला पड़ता गया। आज हम आपको राजेश खन्ना की ज़िंदगी से जुड़े ऐसे 12 दिलचस्प किस्से बताएंगे जो बहुत कम लोग जानते हैं।

जब सुपरस्टार राजेश खन्ना पब्लिक टॉयलेट की लाइन में खड़े थे

एक समय था जब राजेश खन्ना की एक झलक पाने के लिए लड़कियाँ ख़ून से चिट्ठियाँ लिखती थीं, लेकिन सुपरस्टार युग ढलने के बाद उनकी हालत बेहद बदल गई। कहा जाता है कि अपनी आख़िरी हिट फिल्मों में से एक ‘जय शिव शंकर’ (‘Jai Shiv Shankar’) से पहले वे वैष्णो देवी दर्शन के लिए गए थे। वहाँ उन्होंने एक आम यात्री की तरह डिब्बा लेकर सार्वजनिक शौचालय की कतार में खड़े होकर इंतज़ार किया। उनके साथ मौजूद लोगों ने जब पूछा कि आप पहचान छुपा क्यों रहे हैं, तो उन्होंने बस इतना कहा “नाम खराब हो गया है, अब पहचान से क्या फायदा।” यह किस्सा उस इंसान की सच्चाई दिखाता है जिसने शोहरत की ऊँचाई भी देखी और गुमनामी की चुभन भी।

जब लड़कियाँ ज़मीन से उनकी गाड़ी का धूल उठाकर माथे से लगाती थीं

राजेश खन्ना की लोकप्रियता इतनी ज़बरदस्त थी कि उनके घर के बाहर रोज़ सैकड़ों लड़कियाँ जमा रहती थीं। कई बार वे उनकी गाड़ी के टायरों की मिट्टी उठाकर माथे से लगाती थीं। कुछ फैंस ने तो उनकी तस्वीर से शादी तक कर ली थी। यह दीवानगी भारतीय सिनेमा में पहले कभी नहीं देखी गई थी। लोग कहते थे कि “राजेश खन्ना नहीं, एक जुनून है।”

जब अमिताभ बच्चन ने उनकी जगह ले ली

1971 में आई फिल्म ‘आनंद’ (Anand) हिंदी सिनेमा के इतिहास की एक यादगार फिल्म मानी जाती है। इस फिल्म में पहली बार राजेश खन्ना और अमिताभ बच्चन (Amitabh Bacchan) आमने-सामने दिखाई दिए। उस समय राजेश खन्ना देश के सबसे बड़े सुपरस्टार थे। लगातार 15 सोलो सुपरहिट फिल्में दे चुके थे, जबकि अमिताभ बच्चन अभी संघर्ष के दौर में थे। फिल्म में राजेश खन्ना ने आनंद सहगल का भावुक किरदार निभाया, वहीं अमिताभ बच्चन ने गंभीर और शांत डॉक्टर भास्कर बनर्जी की भूमिका निभाई। फिल्म सुपरहिट हुई, लेकिन यहीं से इंडस्ट्री की हवा धीरे-धीरे बदलने लगी। दर्शकों और समीक्षकों ने अमिताभ बच्चन के अभिनय को खास तौर पर नोटिस किया। उनकी भारी आवाज़, संवाद अदायगी और गंभीर व्यक्तित्व लोगों को आकर्षित करने लगा। इसके बाद ‘ज़ंजीर’, ‘दीवार’ और ‘शोले’ जैसी फिल्मों ने अमिताभ को “एंग्री यंग मैन” बना दिया जो उस दौर के युवाओं की नाराज़गी और गुस्से की आवाज़ थी।

अमिताभ बच्चन की तस्वीर
“एंग्री यंग मैन” Wikimedia Commons

वहीं राजेश खन्ना की रोमांटिक छवि समय के साथ पुरानी पड़ने लगी। कहा जाता है कि यह बदलाव राजेश खन्ना को अंदर से तोड़ गया, लेकिन उन्होंने कभी सार्वजनिक रूप से इसे स्वीकार नहीं किया।

जब सलमान खान ने मुफ्त में फिल्म करने की पेशकश की

जब राजेश खन्ना का मशहूर बंगला ‘आशीर्वाद’ टैक्स विवाद 2007 ('Aashirwad' tax controversy) में फँस गया, तब यह दौर उनके जीवन का सबसे कठिन समय माना जाता है। कभी जिस बंगले पर फैंस की भीड़ लगी रहती थी, वही घर अब कानूनी उलझनों और आर्थिक दबाव का कारण बन गया था। इसी मुश्किल वक्त में सलमान खान ने आगे बढ़कर मदद का हाथ बढ़ाया। सलमान खान, जो राजेश खन्ना को बेहद सम्मान की नजर से देखते थे, उन्होंने उनसे साफ शब्दों में कहा कि अगर जरूरत पड़े तो वे बिना किसी फीस के उनकी फिल्म में काम करने को तैयार हैं, ताकि उन्हें आर्थिक राहत मिल सके।

लेकिन राजेश खन्ना ने इस पेशकश को बेहद शालीनता के साथ ठुकरा दिया। उन्होंने कहा, “मैं एहसान लेकर नहीं जी सकता।” यह वाक्य उनके व्यक्तित्व और आत्मसम्मान को साफ दर्शाता है। भले ही उनका करियर ढलान पर था, लेकिन स्वाभिमान से समझौता करना उन्हें मंज़ूर नहीं था।

जब उन्होंने शराब को सहारा बना लिया

राजेश खन्ना की ज़िंदगी का एक दौर ऐसा भी आया, जब शोहरत, तालियों और भीड़ से भरी दुनिया अचानक बेहद सूनी लगने लगी। एक समय था जब हर निर्माता-निर्देशक उनकी तारीख़ के लिए लाइन में खड़ा रहता था, लेकिन जैसे-जैसे उनका करियर ढलने लगा, वैसे-वैसे काम मिलना कम होता गया। इंडस्ट्री से जुड़े कई लोगों ने बाद में माना कि इस मानसिक दबाव के दौरान राजेश खन्ना ने शराब की ओर झुकाव बढ़ा लिया था। यह शराब उनके लिए शौक नहीं, बल्कि दर्द से भागने का एक ज़रिया बन गई थी।

जब राजनीति भी उन्हें नहीं बचा पाई

सिनेमा में सुपरस्टार का शिखर देखने के बाद राजेश खन्ना ने जब राजनीति की राह पकड़ी, तो लोगों को लगा कि यहाँ भी उनका जादू चलेगा। वर्ष 1992 में वे कांग्रेस के टिकट पर नई दिल्ली लोकसभा सीट से सांसद बने। चुनाव जीतने में उनकी लोकप्रियता ने बड़ी भूमिका निभाई, लेकिन राजनीति का मैदान फिल्मों से बिल्कुल अलग निकला। संसद में राजेश खन्ना उतने सक्रिय नहीं रह पाए, जितनी उनसे उम्मीद की जा रही थी। उनकी उपस्थिति धीरे-धीरे कम होती गई, और कई अहम बहसों में वे नजर नहीं आए। कहा जाता है कि राजनीति की कठोरता, समझौते और रणनीति उन्हें रास नहीं आई। वे न तो पूरी तरह राजनेता बन पाए और न ही सिनेमा में पहले जैसी वापसी कर सके। कुछ समय बाद उन्होंने खुद को राजनीति से अलग-थलग कर लिया और सक्रिय सार्वजनिक जीवन से दूरी बनाने लगे।

राजेश खन्ना की तस्वीर
संसद में राजेश खन्ना उतने सक्रिय नहीं रह पाए, जितनी उनसे उम्मीद की जा रही थी।Wikimedia Commons

जब आख़िरी दिनों में लोग मिलने नहीं आते थे

कभी राजेश खन्ना के बंगले पर सुबह से शाम तक लोगों की भीड़ लगी रहती थी,मिलने के लिए सिफ़ारिशें ढूंढी जाती थीं, वही व्यक्ति जब अपने जीवन के आख़िरी दिनों में पहुँचा, तो हालात बिल्कुल बदल चुके थे। समय के साथ पद चला गया, ताक़त चली गई और धीरे-धीरे लोग भी दूर होते चले गए। जो कभी बिना बुलाए आते थे, अब वे हालचाल पूछने तक नहीं पहुँचे।

डिंपल कपाड़िया से दूरी का दर्द

डिंपल कपाड़िया से दूरी का दर्द राजेश खन्ना के जीवन की सबसे गहरी और खामोश पीड़ाओं में से एक माना जाता है। शादी के बंधन में बंधने के बावजूद यह रिश्ता कभी पूरी तरह एक साथ सांस नहीं ले सका। हालात ऐसे बने कि दोनों को 1984 में अलग-अलग रास्तों पर चलना पड़ा। बाहर से भले ही सब कुछ सामान्य दिखता रहा, लेकिन भीतर एक अधूरापन लगातार मौजूद रहा। कहा जाता है कि रिश्ते की शुरुआत उम्मीदों से भरी थी, लेकिन समय, परिस्थितियों और जिम्मेदारियों ने इस दूरी को और गहरा कर दिया। साथ रहते हुए भी दोनों के बीच भावनात्मक फासला बढ़ता गया। समाज की नजरों में वे पति-पत्नी थे, लेकिन निजी जीवन में अकेलापन साफ झलकता था।

बेटियों के लिए बेहद भावुक पिता

ट्विंकल और रिंकी के लिए राजेश खन्ना सिर्फ एक मशहूर अभिनेता नहीं, बल्कि एक बेहद संवेदनशील और भावुक पिता थे। कैमरे के सामने सख़्त और आत्मविश्वासी दिखने वाले इस शख़्स का दिल बेटियों के सामने पूरी तरह पिघल जाता था। उनकी छोटी-छोटी उपलब्धियाँ भी उन्हें भीतर तक खुशी से भर देती थीं। कहा जाता है कि बेटियों की पढ़ाई, उनके फैसलों और करियर को लेकर वे हमेशा चिंतित रहते थे, लेकिन कभी अपने सपने उन पर थोपे नहीं। ट्विंकल की रचनात्मक सोच और रिंकी की सादगी उन्हें खास तौर पर पसंद थी। जब बेटियाँ आगे बढ़ती थीं, तो उन्हें लगता था कि उनकी ज़िंदगी की सबसे बड़ी कमाई यही है।

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जब बीमारी ने उन्हें तोड़ दिया

कैंसर से लंबी लड़ाई राजेश खन्ना के जीवन का सबसे कठिन दौर बन गई थी। जो इंसान कभी अपनी बुलंद आवाज़ और जोशीले अंदाज़ के लिए जाना जाता था, वही धीरे-धीरे खामोश हो गया। बीमारी ने न सिर्फ़ उनके शरीर को, बल्कि उनकी ऊर्जा और आत्मविश्वास को भी भीतर से तोड़ दिया था। इलाज के दौरान असहनीय दर्द था, लेकिन उन्होंने कभी किसी से शिकायत नहीं की। चेहरे पर हल्की मुस्कान और आंखों में गहरी थकान यही उनकी पहचान बन गई थी। वे नहीं चाहते थे कि उनकी तकलीफ़ से परिवार या चाहने वाले परेशान हों। अस्पताल के कमरों में बीतते लंबे दिन और अकेली रातें उन्हें भीतर ही भीतर कमजोर कर रही थीं, लेकिन हिम्मत अब भी बाकी थी। यह लड़ाई सिर्फ़ बीमारी से नहीं, बल्कि खुद को टूटने से बचाने की भी थी। उन्होंने चुपचाप दर्द सहा और आख़िरी सांस तक गरिमा बनाए रखी।

अंतिम संवाद – ‘Time is up’

ज़िंदगी के आख़िरी पल अक्सर इंसान की पूरी कहानी कह जाते हैं। राजेश खन्ना के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ। जब शरीर पूरी तरह थक चुका था और सांसें जवाब देने लगी थीं, तब उन्होंने बेहद शांत स्वर में बस इतना कहा “Time is up, pack up.” ये शब्द किसी फ़िल्मी डायलॉग जैसे लगते हैं, लेकिन असल में यह एक ऐसे इंसान की स्वीकारोक्ति थी, जिसने ज़िंदगी को पूरे जुनून से जिया। मानों एक सुपरस्टार ने खुद अपने जीवन की फ़िल्म का क्लाइमेक्स (Climax) तय कर लिया हो। न कोई शिकायत, न कोई डर सिर्फ़ सच्चाई को स्वीकार करने का साहस। उनके ये आख़िरी शब्द आज भी लोगों के दिलों में गूंजते हैं। ये सिर्फ़ विदाई नहीं थे, बल्कि यह संदेश भी था कि हर चीज़ का एक समय होता है। जब वो समय पूरा हो जाए, तो शांति से पर्दा गिरा देना ही सबसे बड़ी बहादुरी होती है।

मरने के बाद भी फैंस की भीड़

2012 में राजेश खन्ना के जाने के बाद यह साफ़ हो गया कि असली स्टारडम मौत के साथ खत्म नहीं होता। अंतिम यात्रा के दिन सड़कों पर उमड़ा जनसैलाब इस बात का सबसे बड़ा सबूत था। लाखों लोग, जिनमें बूढ़े, जवान, बच्चे सब शामिल थे, बस एक आख़िरी झलक पाने के लिए घंटों खड़े रहे। कई फैंस की आंखों में आंसू थे, तो कई के हाथों में उनकी तस्वीरें। किसी ने फूल चढ़ाए, तो किसी ने दिल से दुआ दी। ऐसा लग रहा था जैसे पूरा शहर थम गया हो। पुलिस और प्रशासन के तमाम इंतज़ाम भी इस भीड़ के सामने छोटे पड़ गए। यह भीड़ सिर्फ़ एक अभिनेता को अलविदा कहने नहीं आई थी, बल्कि उस इंसान को सम्मान देने आई थी, जिसने दशकों तक लोगों के दिलों पर राज किया। सच साबित हुआ स्टारडम जाता है, यादें हमेशा ज़िंदा रहती हैं। [Rh]

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