एक टीस, एक तकलीफ... क्यों बनती हैं सरहदें, क्यों होता है बंटवारा? गंगासागर तलवार बन गए ‘सागर सरहदी’

विभाजन की टीस से जन्मी संवेदनशील कलम, जिसने गंगासागर तलवार को ‘सागर सरहदी’ बना दिया और सरहदों के जख्मों को शायरी, नाटकों व फिल्मों के जरिए आवाज दी
एक टीस, एक तकलीफ... क्यों बनती हैं सरहदें, क्यों होता है बंटवारा? गंगासागर तलवार बन गए ‘सागर सरहदी’
एक टीस, एक तकलीफ... क्यों बनती हैं सरहदें, क्यों होता है बंटवारा? गंगासागर तलवार बन गए ‘सागर सरहदी’IANS
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“मैं पल दो पल का शायर हूं...” ये लाइन सुनते ही दिल में एक टीस उठती है। ये लाइनें किसी ऐसे शख्स की हैं, जिसने देश के बंटवारे की पीड़ा को अपनी रगों में महसूस किया था। वो शख्स थे शब्दों से दुनिया को छूने वाले शायर सागर सरहदी, जिनका असली नाम था गंगासागर तलवार।

सागर सरहदी सिर्फ शायर या फिल्मकार नहीं थे, वे एक संवेदनशील इंसान भी थे। विभाजन की पीड़ा को उन्होंने कभी नहीं भुलाया। प्रकृति से उनका गहरा नाता था। उनके शब्दों में गांव की मिट्टी, दरिया की आवाज और सरहद की तकलीफ साफ महसूस होती थी।

सन् 1933 के मई महीने की 11 तारीख को अविभाजित भारत के एक छोटे से गांव बाफा (एबाटाबाद) में जन्में सागर सरहदी को प्रकृति से घिरा सुंदर गांव, बहता दरिया, हरे-भरे पहाड़ और तारों भरा आसमान मिला और इसी से भरा रहा उनका बचपन। लेकिन, मां की छांव जल्दी छिन गई। फिर भी जीवन के सफर में वह आगे बढ़ते रहे। जब वह मात्र 14 साल के थे, देश का विभाजन हो गया। एक तूफान आया और सब कुछ बदल गया।

परिवार के साथ वह पहले श्रीनगर पहुंचे और फिर दिल्ली के रिफ्यूजी कैंप में आ गए। एक छोटे से गांव से उजड़कर वे शरणार्थी बन गए। इस घटना ने उनके मन में गहरी टीस पैदा कर दी क्यों बनती हैं सरहदें? क्यों होता है बंटवारा? क्यों लोग अपनी जड़ों से उखाड़ दिए जाते हैं? इसी पीड़ा ने उन्हें अपना नाम बदलने के लिए प्रेरित किया। गंगासागर तलवार बन गए सागर सरहदी। सरहद की पीड़ा को नाम का हिस्सा बना लिया।

मुंबई आने के बाद भी उनकी जिंदगी संघर्ष भरी रही। कई नौकरियां कीं, लेकिन नौकरी उनका मकसद नहीं था, लिहाजा वह कहीं टिक ही नहीं पाते थे। वास्तव में उनके अंदर रचनात्मकता का खजाना भरा था। फिर क्या उन्होंने कलम कागज उठाए और उर्दू में नाटक लिखने शुरू किए ‘शहीद भगत सिंह’, ‘हीर रांझा’, ‘तनहाई’ जैसे नाटक बेहद लोकप्रिय भी हुए। फिर अगला कदम फिल्मों की दुनिया में रखने का था।

साल 1974 में ‘गूंज’ से शुरुआत की। यश चोपड़ा से मुलाकात के बाद उनका करियर नई ऊंचाइयों को छूने लगा। ‘कभी कभी’ में उन्होंने संवाद और पटकथा लिखी। इसके बाद ‘सिलसिला’, ‘चांदनी’, ‘नूरी’, ‘बाजार’ जैसी फिल्में आईं। 1982 में उन्होंने ‘बाजार’ फिल्म का निर्देशन भी किया, जिसमें नसीरुद्दीन शाह, स्मिता पाटिल और फारूख शेख जैसे कलाकार थे।

राकेश रोशन ने जब ऋतिक रोशन को लॉन्च करने का फैसला किया तो संवाद लिखने के लिए उन्होंने सागर सरहदी को चुना। फिल्म ‘कहो ना प्यार है’ के गाने आज भी लोकप्रिय हैं। 22 मार्च 2021 को मुंबई में उन्होंने आखिरी सांस ली।

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(यह रिपोर्ट IANS न्यूज़ एजेंसी से स्वचालित रूप से ली गई है। न्यूज़ग्राम इस कंटेंट की कोई ज़िम्मेदारी नहीं लेता।)

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