

संगीत की दुनिया में 12 अप्रैल 2026 एक ऐसा दिन बन गया, जब हमने एक उम्दा कलाकार खो दिया। आशा भोसले (Asha Bhosle) ने 92 साल (8 September 1933 - 12 April 2026) की उम्र में इस दुनिया को अलविदा कह दिया, लेकिन उनकी आवाज़ आज भी हर दिल में ज़िंदा है। 1970 का दौर संगीत की दुनिया का एक अनोखा साल है जब बॉलीवुड में एक से बढ़कर एक हिट गाने आए। इसी दौर में आया ‘दम मारो दम’ (1971), जिसने खुद को सिर्फ एक हिट गाने तक सीमित नहीं रखा, बल्कि पूरी एक पीढ़ी की पहचान बन गया। फिल्म ‘हरे रामा हरे कृष्णा’ का यह गीत आज भी उतना ही ताज़ा और आइकॉनिक लगता है, जितना उस समय था। इसकी धुन, बोल और बेबाक अंदाज़ ने युवाओं के दिलों में एक अलग ही जुनून जगा दिया था।
लेकिन इस सुपरहिट गाने के पीछे एक ऐसी कहानी छुपी है, जिसे बहुत कम लोग जानते हैं। शुरुआत में इस गीत को एक खास डुएट के रूप में तैयार करने की योजना थी जहां एक तरफ होतीं सुरों की मलिका आशा भोसले, और दूसरी तरफ अपनी अनोखी, भारी आवाज़ के लिए मशहूर ऊषा उत्थुप। लेकिन अंत में यह गया ऊषा जी के हाथों से चला गया और “दम मारो दम” एक सोलो गाने के रूप में सामने आया जो आगे चलकर इतिहास में अमर हो गया।
उषा उत्थुप (Usha Uthup) भारत की सबसे अलग और दमदार आवाज़ों में से एक मानी जाती हैं। प्रसिद्ध गायिका ऊषा उत्थुप (Usha Uthup) का जन्म 8 नवंबर 1947 को मुंबई (तत्कालीन बॉम्बे) में हुआ था। वह एक तमिल ब्राह्मण परिवार से ताल्लुक रखती हैं और उनके पिता वैधनाथ सोमेश्वर सामी पुलिस विभाग में थे। बचपन से ही उन्हें संगीत का शौक था, लेकिन उनकी भारी और अलग आवाज़ के कारण शुरुआत में उन्हें पारंपरिक प्लेबैक सिंगिंग में ज्यादा मौके नहीं मिले।
उन्होंने अपने करियर की शुरुआत नाइटक्लब सिंगिंग से की, जहां उनकी आवाज़ और स्टाइल ने लोगों को दीवाना बना दिया। साड़ी और बड़ी बिंदी में पॉप और जैज़ गाने वाली उषा उत्थुप ने अपनी अलग पहचान बनाई। उनकी लोकप्रियता तब तेजी से बढ़ी जब उन्होंने फिल्म हरे राम हरे कृष्ण (Hare Rama Hare Krishna) में अंग्रेज़ी वर्ज़न गाया और बाद में “हरि ओम हरि” (“Hari Om Hari”) जैसे गाने बॉलीवुड को दिए। उनकी अनोखी आवाज़ ही उनकी सबसे बड़ी ताकत बनी, जिसने उन्हें बाकी सिंगर्स से अलग खड़ा किया।
फिल्म ‘हरे रामा हरे कृष्णा’ (Hare Rama Hare Krishna) का सुपरहिट गाना ‘दम मारो दम’ शुरू में सिर्फ एक गीत नहीं, बल्कि एक म्यूजिकल एक्सपेरिमेंट (Musical Experiment) के तौर पर तैयार किया जा रहा था। म्यूजिक डायरेक्टर आर. डी. बर्मन (R. D. Burman) इसे दो बिल्कुल अलग आवाज़ों के मेल के रूप में पेश करना चाहते थे। एक तरफ सुरों की महारथी आशा भोसले, और दूसरी तरफ अपनी अनोखी, गहरी आवाज़ के लिए जानी जाने वाली ऊषा उत्थुप।
सोचिए, अगर ये डुएट बनता तो शायद गाने का रंग ही कुछ और होता। उषा उत्थुप (Usha Uthup) ने इस गाने के लिए इंग्लिश के कुछ बोल दिए थे, डुएट के लिए गाना सैंपल के तौर पर रिकॉर्ड भी किया गया लेकिन किस्मत ने यहां एक अलग ही खेल खेल दिया। रिकॉर्डिंग के दिन अचानक ऐसा मोड़ आया कि उषा उत्थुप को न तो बुलाया गया और न ही इस बदलाव की कोई खबर दी गई। आखिरी समय में लिए गए फैसलों और इंडस्ट्री की अंदरूनी उठापटक ने इस डुएट को सोलो में बदल दिया।
नतीजा यह हुआ कि “दम मारो दम” (1971) सिर्फ आशा भोसले की आवाज़ में रिकॉर्ड हुआ और इतिहास रच गया। हालांकि उषा उत्थुप इस सफर से पूरी तरह बाहर नहीं हुईं; उन्होंने गाने के अंग्रेज़ी हिस्सों में अपनी आवाज़ दी और बाद में इसका अलग वर्ज़न भी गाया।
भले ही वक्त बदल गया हो, लेकिन उषा उत्थुप की आवाज़ का जादू आज भी वैसा ही कायम है। वह संगीत की दुनिया में अपने अलग और अनोखे अंदाज़ के साथ लगातार एक्टिव हैं। आज भी वह लाइव कॉन्सर्ट्स में स्टेज पर उतरती हैं और अपनी दमदार आवाज़ से देश ही नहीं, विदेशों में भी दर्शकों का दिल जीत लेती हैं। कोलकाता को अपना घर बना चुकी उषा उत्थुप सिर्फ एक सिंगर ही नहीं, बल्कि एक सांस्कृतिक पहचान बन चुकी हैं। वह अक्सर सामाजिक कार्यक्रमों, सांस्कृतिक आयोजनों और चैरिटी इवेंट्स में हिस्सा लेती हैं, जहां उनका जुड़ाव लोगों के साथ और भी गहरा नजर आता है।
आपको बता दें कि उनके संगीत में योगदान को देखते हुए भारत सरकार ने उन्हें पद्म श्री और पद्म भूषण से सम्मानित किया था। जो इस बात का सबूत है कि उनकी कला कितनी खास है। [SP]