

जयपुर के जवाहर कला केंद्र में एक आर्ट एंड क्राफ्ट फेयर चल रहा है जिसमें एक अनोखी पेंटिंग के बारे में पता चला। ये पेंटिंग सिर्फ खूबसूरत नहीं है बल्कि 100 साल तक की वैलिडिटी के साथ फेयर में आई है। बोमन अली नाम के एक कलाकार ने इस फेयर में हिस्सा लिया था जो भुवनेश्वर से आए हैं। उन्होंने अपनी पारंपरिक पट्टचित्र कला (Pattachitra Art) की एक झलक यहां पेश की। इस खास कला में केले के पत्तों पर सुई की नोक से बेहद महीन और बारीक डिज़ाइन उकेरे गए थें। जो देखने में किसी जादू से कम नहीं लग रहे थें। आपको बता दें कि केले के पत्ते पर उकेरी गई डिजाइन सिर्फ एक पेंटिंग नहीं, बल्कि सदियों पुरानी परंपरा और धैर्य का प्रतीक भी है। बोमन अली (Boman Ali) बताते हैं कि यह कला उनके परिवार में पीढ़ियों से चली आ रही है, जिसे वे आज भी पूरी लगन और पारंपरिक तरीके से आगे बढ़ा रहे हैं। यही वजह है कि यह कला आज भी उतनी ही खास और आकर्षक बनी हुई है। तो आईए जानते हैं इस अनोखी चित्रकला के बारे में।
पाम लीफ आर्ट (Palm Leaf Art), जिसे उड़ीसा की पारंपरिक पट्टचित्र कला (Pattachitra Art) का एक खास रूप माना जाता है, अपनी अनोखी तकनीक और खूबसूरती के लिए जानी जाती है। इस कला में साधारण कागज या कैनवास नहीं, बल्कि सूखे ताड़ (पाम) के पत्तों का इस्तेमाल किया जाता है। कलाकार इन पत्तों को पहले अच्छी तरह सुखाकर और दबाकर एक साथ सिलते हैं, जिससे एक मजबूत सतह तैयार होती है। इसके बाद सुई जैसी नुकीली चीज़ से बेहद बारीक रेखाओं में चित्र उकेरे जाते हैं। फिर इन उकेरी गई लाइनों में काजल या प्राकृतिक रंग रगड़कर डिजाइन को उभारा जाता है, जिससे चित्र साफ और गहरा दिखने लगता है। इस कला में रामायण, महाभारत और भगवान जगन्नाथ (Lord Jagganath) की कहानियां जीवंत हो उठती हैं। आपको बता दें कि रघुराजपुर गांव में आज भी करीब 56 परिवार इस परंपरा से जुड़े हैं और इसे पीढ़ियों से आगे बढ़ा रहे हैं। खास बात यह है कि आज के डिजिटल दौर में भी यह कला खत्म नहीं हुई, बल्कि देश-विदेश में इसकी डिमांड बढ़ी है। कलाकार अब पारंपरिक डिज़ाइन के साथ-साथ मॉडर्न थीम्स भी बना रहे हैं, जिससे यह प्राचीन कला आज भी ज़िंदा और प्रासंगिक बनी हुई है।
उड़ीसा की पट्टचित्र कला (Pattachitra Art) सिर्फ एक पेंटिंग नहीं, बल्कि कहानियों को जीवंत करने का अनोखा माध्यम है। बोमन अली बताते हैं कि इस कला में भगवान जगन्नाथ, राधा-कृष्ण की लीलाएं, गणपति और कई देवी-देवताओं की छवियां इतनी बारीकी से उकेरी जाती हैं कि हर चित्र खुद एक कहानी कहता है। इसके अलावा रामायण और महाभारत जैसे महाकाव्यों के दृश्य भी इसमें खास तौर पर दिखाए जाते हैं, जिससे यह कला और भी खास बन जाती है। इसकी एक दिलचस्प बात यह है कि इसमें केले के पत्तों का इस्तेमाल किया जाता है, जो आमतौर पर दक्षिण भारत में भोजन परोसने और सजावट के लिए जाने जाते हैं। इन्हीं पत्तों को खास तरीके से तैयार कर उन पर महीन नक्काशी की जाती है। उड़ीसा में यह परंपरा सालों से चली आ रही है और आज भी रघुराजपुर गांव के कलाकार इसे पूरे समर्पण के साथ आगे बढ़ा रहे हैं। यही वजह है कि यह कला आज भी देश-विदेश में लोगों को आकर्षित कर रही है।
पाम लीफ आर्ट (Palm Leaf Art) की खूबसूरती जितनी आकर्षक होती है, उसे बनाना उतना ही मुश्किल काम है। बोमन अली बताते हैं कि केले के पत्तों की परत बेहद पतली और नाजुक होती है, इसलिए उस पर सुई से बारीक डिजाइन उकेरना काफी धैर्य और अनुभव मांगता है। इस पूरी प्रक्रिया में मशीन का नहीं, बल्कि हाथों का ही इस्तेमाल होता है, जिससे हर पेंटिंग एक यूनिक पीस बन जाती है। इस कला की एक खास बात यह भी है कि बड़ी पेंटिंग को भी आसानी से फोल्ड करके छोटे आकार में रखा जा सकता है, जो इसे और खास बनाता है। कीमत की बात करें तो ये पेंटिंग्स 500 रुपये से शुरू होकर हजारों तक पहुंच जाती हैं। जवाहर कला केंद्र (Jawahar Art Centre) में लगे फेयर में 62 हजार रुपये तक की पेंटिंग भी देखने को मिलती है। हालांकि ज्यादातर लोग 5 से 10 हजार रुपये तक की पेंटिंग घर सजाने के लिए खरीदते हैं, जबकि महंगी पेंटिंग्स खास ऑर्डर पर तैयार की जाती हैं। [SP/MK]