आवश्यकता है, सच्चे धर्म-रक्षकों की

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अमित श्रीवास्तव

हिन्दू अर्थात सनातनी परम्परा में जन्मे किसी भी व्यक्ति को ‘धर्म’ शब्द का व्यापक अर्थ अवश्य पता होता है। हमारा धर्म संसार में प्रचलित पंथों: इस्लाम, इसाईयत और अन्य पंथों से कहीं व्यापक है।  प्रदूषित शिक्षा पद्धति और विरोधी प्रचार-तंत्रों के बावजूद भारतीय दर्शन की महत्ता विश्व भर में बढ़ी ही है।  हमारे शास्त्रों में कहा गया है:

धर्म एव हतो हन्ति धर्मो रक्षति रक्षितः।
तस्माद्धर्मो न हन्तव्यः मानो धर्मो हतोवाधीत्॥

“धर्म उसका नाश करता है जो धर्म का नाश करता है। धर्म की रक्षा करो, तुम स्वतः रक्षित हो जाओगे। अतः धर्मका नाश नहीं करना चाहिए, ध्यान रहे धर्मका नाश करनेवाले का सर्वनाश  अवश्यंभावी है।” हमारे पूर्वजों ने अपना अस्तित्व बचाए रखने के लिए अनगिनत संघर्ष किए और धर्म को बचाए रखा। बालक वीर हकीकत राय, गुरु अर्जुन सिंह के चारों बेटों समेत हजारों हिन्दू युवकों का मुग़लों ने बस इसलिए मार दिया क्योंकि उन्होंने हिन्दू धर्म छोड़ इस्लाम अपनाने से मना कर दिया था।

यहाँ तक कि आधुनिक भारत के इतिहास में टीपू सुल्तान ने लाखों हिन्दुओं का कत्लेआम किया, लाखों ब्राह्मणों का धर्म परिवर्तन कराया और अनगिनत मंदिर तोड़े। यह क्षरण कश्मीर, केरल और बंगाल में आज भी जारी है। पाकिस्तान और बांग्लादेश  के हिन्दुओं की दशा तो जानवरों से भी बुरी है। इतिहास में पहली बार शेष बचे भारतवर्ष में हिन्दुओं का अनुपात  80% से भी नीचे चला गया है। जम्मू-कश्मीर, केरल तथा असोम में हिन्दू तो अल्पसंख्यक हो ही चुके हैं; उत्तर-प्रदेश, बिहार व पश्चिम बंगाल के कई जिलों में हिन्दुओं की दशा ईराक के यज़ीदियों से भी बदतर है।  भारत का विभाजन किस वजह से हुआ, यह सर्वविदित है। किन्तु सबसे दयनीय स्थिति यह है कि हम इसके बारे में कुछ नहीं कर पा रहे। ना ही आने वाले संभावित खतरों से निबटने के लिए सक्षम हैं। आज इन्टरनेट और सोशल मीडिया के ज़माने में हिन्दू युवकों को जागरूक कर इस दिशा में प्रयासरत करना हमारा दायित्व है। एक सुरक्षित भारत के लिए यह आवश्यक हैं कि हम इस दिशा में सक्रिय हो जाएँ।

हमें शुरुआत अपनी समझ व अपने परिवार-समाज की समझ बढ़ाने से करनी चाहिए। स्वतंत्रता पश्चात् नेहरु ने हिन्दुओं के साथ क्षल करते हुए तथाकथित ‘अल्पसंख्यकों’ को, खास कर मुसलमानों को हिन्दुओं से कहीं अधिक अधिकार दे दिए। साथ ही हिन्दू धर्म से जुड़ी सभी परम्पराओं और मान्यताओं को हेय दृष्टी से देखा जाने लगा।  यह परिपाटी आजतक बेरोक टोक के चली आ रही है। साथ ही भारतीय संविधान द्वारा अल्पसंख्यकों को बहुसंख्य हिन्दुओं से कहीं अधिक अधिकार दिये गए हैं।

परिणामतः आज अधिसंख्य हिन्दू समाज बेतुकी आत्मग्लानी में जी रहा है जिसका कोई औचित्य ही नहीं। इसी मानसिकता का फायदा उठाकर एक क्षद्म पंथ-निरपेक्षता फैलाई गयी, जिसे आजकल ‘सेकुलरिज्म’ कहा जाता है। यह सेकुलरिज्म मुस्लिमों द्वारा किये जा रहे सभी अपराधों और आतंकी घटनाओं को नजरंदाज़ करता है और हिन्दुओं के सभी अच्छाइयों की आलोचना करता है। इसी इस्लामिक सेकुलरिज्म का प्रभाव है कि जब कोई ‘जय श्री राम’ कह कर अभिवादन करता है तो उसे सांप्रदायिक करार दे दिया जाता है, और जब कोई ‘सलाम-अ-लेकुम’, ‘अल्लाह हाफिज’ आदि कहता है तो उसे सेक्युलर कहा जाता है। इस्लामिक सेक्युलर द्वारा आरोपित मानसिकता का परिणाम यह है कि आज पढ़े लिखे हिन्दुओं ही ‘जय श्री राम’ कहने वाले हिन्दुओं को अपना दुश्मन समझने लगते हैं।

सभी मीडिया, कम्युनिस्ट तथा सपा, बसपा, राजद, जदयू आदि राजनितिक दलों द्वारा प्रचलित यह इस्लामिक सेकुलरिज्म की हद तो यह है कि ये लोग विश्वभर में हो रही इस्लामिक आतंकवाद की घटनाओं की आलोचना तक नहीं करते। इन हिन्दू विरोधियों का मुकाबला करने से पूर्व हमें इनके तंत्र की समझ होनी चाहिए। कृत्रिम आत्मग्लानि को उतर फेंकना होगा और एक हिंदुत्व आन्दोलन खड़ा करना होगा जो मात्र सत्ता केन्द्रित ना रहे, अपितु सांस्कृतिक एवं सामाजिक सुरक्षा और अपने अस्तित्व के लिए भी तत्पर रहे।

आपने अक्सर देखा होगा, टीवी पर बहस के दौरान मुस्लिम मौलवी और सेक्युलर विद्वान बहुत आनंद लेते हुए हिन्दू परम्पराओं का मजाक उड़ाते हैं, और इनके प्रतिवाद में वहाँ उपस्थित हिन्दूवादी लोग अपना बचाव करते नज़र आते हैं। इन तथाकथित हिन्दूवादियों में इतनी हिम्मत नहीं होती कि आक्रामक मौलाविओं के जवाब में ये लोग भी टीवी पर इस्लाम की बर्बर प्रथाओं और कुरीतियों जैसेकि पर्दा प्रथा, शैतान को पत्थर मरना, सड़कों पर खून बहाते हुए मुहर्रम मानना, औरतों की गुप्तांगों का खतना, बहु-विवाह, बाल-विवाह, बलात-विवाह इत्यादि का पर्दाफाश करें। किन्तु ये तथाकथित हिंदुवादी अपनी आत्मग्लानि वाली मानसिकता की वजह से मौलविओं और मिशनरियों का जोरदार तरीके से प्रतिकार नहीं कर पाते हैं और न ही धर्म की रक्षा हेतु कुछ कह पाते हैं।

आज जब उत्तर प्रदेश, असम और पश्चिम बंगाल के हिन्दुओं खासकर हिन्दू महिलाओं को सुनियोजित तरीके से शिकार बनाया जाता है तब न केवल इस्लामिक सेकुलरवादी लोग बल्कि सबका विकास की बात करने वाले लोग भी चुप बैठे तमाशा देखते हैं। स्पष्ट है, कि ऐसे लोग धर्म रक्षा के लिए समर्पित नहीं हैं, अपितु इनका उद्देश्य धर्म की भावनाओं का उपयोग कर सत्ता पाना है। वे सभी क्रियाकलाप जिसे ‘अल्पसंख्यकों की तुष्टिकरण’ कहा जाता था – वैसे क्रियाकलापों को आजकल बढ़ा चढ़ा कर पेश किया जाता है। और तो और इस चीज़ को अंतरराष्ट्रीय मंचों से घोषित भी किया जा रहा है। क्या यह तुष्टिकरण नहीं है? क्या यह भारत के अधिसंख्य हिन्दुओं की उपेक्षा नहीं है? सत्ता आरोहित होतें ही ऐसे लोग उसी कुचक्र को आगे बढ़ाते हैं जिसकी शुरुआत नेहरु ने स्वतंत्रता पश्चात कर दी थी।

आज जरूरत है कि हम अपने इतिहास से सबक ले कर भविष्य के बारे में सोचें। अपनी पीढ़ी तथा आने वाली पीढ़ियों को अपने इतिहास के बारे में बताएं। मुस्लिम शासन के दौरान हिंदुओं पर होने वाले जिन अत्याचारों को भारत के पाठ्य पुस्तकों से जानभूझ का हटाया गया है, उनके बारे में लोगों को बताएं। कुछ तथाकथित हिन्दू-वादी संगठन ऐसे हैं जो, अपनी पहचान और धाक बनाने के लिए जाग्रत हिन्दू युवाओं का उपयोग करते हैं और जब स्वार्थ सिद्ध हो जाता है या वह हिन्दू कार्यकर्ता मुसीबत में पड़ जाता है तो उसे असम्बद्ध घोषित कर दिया जाता है। क्या ऐसे संगठन जो एक व्यक्ति की रक्षा नहीं कर सकते, धर्म की रक्षा करेंगे? ज्वलंत प्रश्न है।

Amit S

~अमित श्रीवास्तव, स्वतंत्र विचारकएवं लेखक

 

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