कश्मीरी संस्कृति का बोझ उठाती कॉशुर भाषा

हर्षमीत सिंह

 

भारत की विविध संस्कृति का भाषाई विविधता से बेहतर कोई उदाहरण नहीं हैं। हमारा देश 780 भाषाओं का घर है और उनमें से 120 को अधिकारिक दर्जा प्राप्त है। लेकिन इस विविधता का दूसरा पहलू ये है कि वर्तमान में भारत यूनेस्को की सूची “वर्ल्ड लैंग्वेजेज इन डेंजर” में है। हमारे संविधान की आठवीं अनुसूची में 22 भाषाओं को आधिकारिक दर्जा दिया गया है। आज इस लेख में हम आपको भारतीय संविधान में आधिकारिक दर्जा प्राप्त कश्मीरी भाषा या कॉशुर के बारे में बता रहे है।

कॉशुर के नाम से प्रसिद्घ कश्मीरी भाषा बोलने वालों की भारत में आबादी 50 लाख से अधिक है,जिनमें से ज्यादातर जम्मू और कश्मीर राज्य से हैं। यह भाषा पाकिस्तान में भी 1 लाख से अधिक लोगों द्वारा बोली जाती है, इनमें वो लोग ज्यादा है जो कश्मीर घाटी छोड़ सीमा के उस पार बस गए। कश्मीरी सबसे प्रमुख दार्दिक भाषाओं में से एक है।

भारत में भाषाई सर्वेक्षण करने वाले आयरिश सिविल सेवक सर जॉर्ज अब्राहम ग्रिएरसन ने लिखा है “कश्मीरी एकमात्र दार्दिक भाषा है, जिसका साहित्य है।” उन्होंने यह भी कहा था कि “कश्मीरी भाषा किसी भी जांच के लिए एक अनिवार्य प्रारंभिक आवश्यकता है।”

साल 2014 में कश्मीरी भाषा और संस्कृति की रक्षा के लिए जम्मू-कश्मीर सांस्कृतिक परिसंघ बनाया गया था,जिसमे एक समान उद्देश्य के लिए 50 से अधिक छोटे संगठन साथ आए थे। कवि और ज्ञानपीठ पुरस्कार विजेता प्रोफेसर रहमान राही को परिसंघ का मुख्य संरक्षक और प्रसिद्ध लेखक गुलाम नबी खयाल को नियुक्त किया गया।

1950 के दशक में कश्मीरी भाषा को सबसे पहले स्कूलों में शिक्षा के माध्यम के रूप में पेश किया गया था लेकिन जल्द ही प्रभावशाली लिपि ना होने के कारण कश्मीरी भाषा को हटा दिया गया। नतीजतन, देश की अन्य क्षेत्रीय भाषाओं की तरह ही पिछले कई दशकों से कश्मीरी की लोकप्रियता में भी भारी गिरावट देखी गई है। कम हो रही लोकप्रियता को ध्यान में रखते हुए जम्मू-कश्मीर की राज्य सरकार ने नवंबर 2008 में माध्यमिक स्तर तक राज्य के सभी स्कूलों में कश्मीरी भाषा को अनिवार्य विषय बना दिया।

कश्मीर का आधुनिक इतिहास संघर्ष के बोझ से दब चुका है। जम्मू-कश्मीर राज्य के स्थानीय लोग केंद्रीय सरकार पर स्वदेशी संस्कृति की उपेक्षा का आरोप लगाते हैं।आरोप सही या गलत लेकिन ये बात सरकार के साथ साथ कश्मीरी भाषा बोलने वालों को भी समझनी पड़ेगी कि संयुक्त प्रयासों से ही कश्मीरी भाषा का अस्तित्व बनाए रखा जा सकता है।

भावानुवाद- आयुष त्यागी