कानूनी विरोधाभास

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ज्योति शर्मा

दादी नानी की कहानियों में हमेशा कहा जाता है , की हमारी बेटी के लिए सफ़ेद घोड़े पर बैठकर एक राजकुमार आएगा जो उसे अपने साथ एक महल में ले जायेगा ! जहाँ  हर तरह की ख़ुशी होगी किसी चीज़ की कोई कमी नहीं होगी , मगर क्या हो जब यह सपना हकीकत बन जाये और असलियत में वो राजकुमार न निकले बल्कि एक हैवान से भी गया बीता हो और उस बेटी के साथ बलात्कार जैसी घटना घट जाये!

कहते है कानून न्याय  करता है साथ ही बचपन से कानून के प्रति न्याय की श्रद्धा रखी  जाती  है! जब किसी को न्याय चाहिए  होता  है  वह  पुलिस  न्यायपालिका  का  ही  दरवाज़ा  खटखटाता  है क्या  हो जब यही न्याय यह कह दे की यह  बलात्कार नहीं  है या  अपने भीतर ही विरोधाभास लाकर पीड़ित प्रताड़ित पक्ष को  दर-दर भटकने  को  छोड़  दे ! शायद यह समझना थोड़ा मुश्किल  हो  गया है  इसे  सरल  शब्दों और क़ानूनी भाषा में समझते है!

कानूनी विरोधाभास आखिर क्या है 

भारतीय दंड संहिता की धारा 375 के अनुसार 15 वर्ष से अधिक उम्र की पत्नी साथ बनाये गए  यौन सम्बन्ध अपराध की श्रेणी में नहीं आते ना ही इन्हे बलात्कार  माना जाता है जबकि बालिक होने और शादी की उम्र तो 18 साल की है. नाबालिक से विवाह फिर यौन सम्बन्ध जैसी शर्मनाक हिंसा को कैसे न्याय के दायरे से बाहर रखा जा सकता है यह सरा-सर विरोधाभास है साथ ही जब वैवाहिक दुष्कर्म की बात आती है तो उन्हें भी मना कर दिया जाता है की ऐसा कुछ नहीं होगा! 29 अप्रैल को भारत सरकार के गृह राज्य मंत्री हरिभाई पार्थीभाई चौधरी ने राज्यसभा में एक सवाल का लिखित जवाब देते हुए :-       

                मनुस्मृति का हवाला दिया साथ ही कहा अशिक्षा,गरीबी,सैकड़ो सामाजिक प्रथाओ

             और धार्मिक मान्यताओ  के कारण भारत में सीधे सीधे इसे लागू नहीं किया जा सकता है”      

इसका अर्थ यह हुआ की महिलाओ पर  होते अन्यायों की सीमा को रोका भी नहीं जायेगा ! साथ ही ध्यान  देने वाली बात यह है की 16 साल की उम्र में शादी करने पर  संभोग कर सकते है,लेकिन वयस्क फिल्म देखने की मनाही है क्योंकि कानून ऐसी फिल्म को देखने के लिए 16 साल की उम्र को परिपक्व नहीं समझता । यही नहीं यह कैसा न्याय है जो नाबालिक द्वारा बलात्कार किये जाने पर उसे बच्चा करार देता है! साथ ही उस पर सामान्य कोर्ट में केस नहीं चलता ना जेल भेजता है परन्तु उसे शादी का अप्रत्यक्ष रूप से अधिकार देता है!

अगर आईपीसी की धारा 375 पर गहन विचार किया  जाये तो, 16 से 17 वर्ष की लड़की को शादी उपरांत संभोग हेतु  परिपक्व समझा जाएगा लेकिन ड्राइविंग लाइसेंस, वोट डालने,के लिए उसे दो साल इंतजार करना होगा,क्योंकि कानून के हिसाब से तो बालिग होने की उम्र 18 साल है। अब सवाल यह उठता है जब अपराध की सज़ा और अधिकारों की उम्र 18 वर्ष है तो इसकी क्यों नहीं!

पूर्व में देखा जाये तो 16 साल की उम्र में सेक्स के लिए मंजूरी होती थी, लेकिन 11 वर्षीय पोलुमि दासी की वैवाहिक बलात्कार कारणवश मृत्यु हो जाने के उपरांत अपराधिक कानून को 2013 में संशोधित कर सहमति से संभोग की आयु 16 से 18 वर्ष कर दी गयी है! उस समय आईपीसी 375 को  क्यों  रद्द  नहीं किया गया साथ ही 16 दिसंबर की घटना के बाद जब बलात्कार की परिभाषा और कानून को सख़्त किया गया तो 375 पर ध्यान क्यों नहीं दिया?

 यूनिसेफ और यूएन के आंकड़ों अनुसार:-

लगभग 33 प्रतिशत से 47 प्रतिशत लड़किया बाल विवाह की शिकार है! केवल बिहार में ही 20 से 24 वर्ष की ऐसी महिलायें है जिनकी शादी 18 साल से पहले हो गयी थी! बिहार में लगभग 65 से 69 प्रतिशत और राजस्थान में लगभग 60 से 65 प्रतिशत ऐसी महिलायें है!  यहाँ तक की विश्व में भारत बालविवाह में दूसरे स्थान पर आता है!

इन शादियों के बाद की मानसिक पीड़ा लड़कियों को घेर लेती है जोकि लड़कियों के विकास और उनके जीवन हेतु बिल्कुल भी ठीक नहीं है और अधिकतर लड़किया समय से पहले माँ बन जाती है! जिसके कारणवश उनकी मृत्यु हो जाती है!

भारत में जहा बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ का नारा और नीति बुलंद करने की कोशिशें सरकार कर रही है,उन्हें यह समझना होगा की नयी नीति लाने से पहले इस प्रकार के कानूनों का खात्मा ज़रूरी है जो लड़कियों को बढ़ने और पढ़ने से रोक रहा है!क्योकि इस तरह की नीतियां तब तक सफल नहीं होगी जब तक ऐसे कानून विद्यमान है!

जब अपराध की सज़ा और वयस्क, शादी की उम्र 18 है तो यह कानून क्यों ? क्या कानून ही आरोपियों को संरक्षित करना चाहता है और बनावटी चेहरा पहन कर मदद न्याय का बस एक खेल ,खेल रहा है! यह सोचने का विषय है!